उत्तराखंड : २०१३ की बाढ़ : प्रकृति का हमें पाठ

उत्तराखंड : २०१३ की प्रलयकारी बाढ़ : प्रकृति का प्रकोप या प्रकृति का हमें पाठ ?


"बादल फटने और मूसलाधार वर्षा से पहाड़ों में पानी बड़ी-बड़ी चट्टानों, पत्थरों और म्ल्बे को नीचे लाया और इस जल प्रवाह ने ऐसा रुद्र रूप लिया कि अपने साथ सब कुछ बहा ले गया  देखते ही देखते ना जाने कितने ही व्यक्ति बह गये, धरती में धस गये, इमारतें, घर, दुकानें, वाहन, सड़कें और यहाँ तक कि कई पूरे के पूरे छोटे गाँव भी उफनती हुई नदियों की जल धारा के वेग में ध्वस्त होकर बह गये 

स्थानीय लोगों के अतिरिक्त , गर्मी की छुट्टियों और चार धाम यात्रा के चलते यह क्षेत्र सैलानियों और तीर्थ यात्रिओं से भी खचाखच भरे थे  स्थिति इतनी गंभीर है कि हम मृतकों की संख्या का अनुमान अगले कई दिनों तक नहीं लगा सकेंगे और संभवतः यह हज़ारों में होगी । ना ही नदियों में बहे या मल्बे में दबे सब लोग या शव मिल पाएँगे  हमारे वीर सैनिक अभी भी बचाव अभियान में युद्धस्तर पर डटे हैं  इसे देश में अब तक की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक बताया जा रहा है"

प्रलयकारी बाढ़
प्रलयकारी बाढ़



समाचार पत्रों , टी.वी.चैनलों , सोशल मीडिया और लोगों से बहुत पढ़ने-सुनने को मिल रहा है कि बहुत भयानक और अभूतपूर्व प्राकृतिक आपदा आई..."उत्तराखंड पर पहाड़ों से आई आफत"  "आसमान से बरसी आफत"..."तबाही की बारिश"..."प्रकृति की विनाश लीला"..."आसमानी आफ़त से पहाड़ तबाह"..."कुदरत ने बरसाया कहर" 


नदी में ढहता मकान
नदी में ढहता मकान

भूस्खलन से नष्ट सडकें
भूस्खलन से नष्ट सडकें

केदारनाथ धाम में मंदिर को छोड़ कर सब 'आधुनिक विकास' के चिन्ह नष्ट हो गए
केदारनाथ धाम में मंदिर को छोड़ कर सब 'आधुनिक विकास' के चिन्ह नष्ट हो गए

कुदरत का कहर या कुदरत का सबक ?

हाल ही में उत्तरांचल (उत्तराखंड) के कई क्षेत्रों, विशेषकर केदारनाथ में आई आकस्मिक बाढ़ और व्यापक भूस्खलन में हुए तांडव से हम सब स्तब्धभयभीत और शोकग्रस्त हैं  मृतकों, आहत और लापता व्यक्तियों और उनके प्रियजनों के साथ हमारी गहरी संवेदनाएँ हैं 

'आफत', 'तबाही', 'विनाश' , ऐसे शब्द और भावनाएं निरंतर सुनने को मिल रही हैं ; और इसका आरोप प्रकृति , पहाड़ों और नदियों पर ऐसे लगाया जा रहा है मानो वे कोई दानवीय कु-शक्तियाँ हों और मनुष्य केवल एक मासूम जीव  हम शायद भूल रहे हैं कि कैसे मनुष्य अपने स्वार्थ और 'विकास' के लिए निरंतर प्रकृति का गला घोंटता आया है  पिछले कुछ दशकों और सालों से प्राकृतिक चक्रों में मानवीय हस्तक्षेप अभूतपूर्व स्तर पर बढ़ता आ रहा है  प्रकृति कई छोटे - बड़े संकेतों ( जैसे बढ़ते तापमान , बिगड़ते मौसम चक्र , पिघलते ध्रुव इत्यादि ) के माध्यम से हमें चेतावनी तो देती आई है किन्तु लोभ और शक्ति के नशे से अंधे मनुष्य ने इन्हें अनदेखा ही किया है 


पहाड़ों में भी अनियंत्रित और अंधाधुंध गतिविधियों का दुष्प्रभाव साफ़ देखा जा सकता है  विकास , पर्यटन, औद्योगिक क्रांति , जल-विद्युत् परियोजनओं के नाम पर हमने अपने देव भूमि कहे जाने वाले हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों (जैसे हिमाचल और उत्तराखंड ) को न केवल बुरी तरह से अपवित्र और प्रदूषित कर दिया है बल्कि उनकी जैव-विविधता और जलवायु को भी संकट में डाल दिया है 

प्राकृतिक सौंदर्य के अतिरिक्त , हिमालय पर्वत हमारे लिए कई तरह से महत्वपूर्ण हैं,  जैसे पर्यावरणनदियाँमौसम-चक्रपेड़-पौधेजीव-जन्तु और सांस्कृतिक , अध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से भी । चूँकि पहाड़ों का पर्यावरण किसी भी छेड़छाड़ के प्रति अत्यंत संवेदनशील होता है इसलिए वहां किसी भी बिना सोची गतिविधि का कुप्रभाव गंभीर होना स्वाभाविक है 

उदहारण के लिए, उत्तराखंड की बाढ़ के समाचारों में मन्दाकिनी नदी को विनाशकारी कहा जा रहा है  पर अगर आपने उत्तराखंड की बाढ़ के चित्र या वीडियो देखें हों तो याद करिए कैसे इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढह रही थी  क्या यह कुदरत का कहर था ? नहीं , ध्यान से दुबारा देखेंगे तो पाएंगे की उनमें से अधिकांश इमारतें बिलकुल नदी के किनारे के ठीक ऊपर बनी थी  पानी के तेज़ बहाव में उनकी नीवों के नीचे से ज़मीन खिसकना स्वाभाविक है  इंसान प्रकृति को अपनी संपत्ति मान के के उस पर पैर धर के बैठा हुआ था ,मन्दाकिनी ने तो बस अपने ऊपर से गलत और लोभी ढंग से किया गया अतिक्रमण हटाया  वो वहां बहती ही है , उसी की ज़मीन है , कब्ज़ा इंसान ने किया हुआ था 


कर्णप्रयाग में ठीक नदी के किनारे के साथ-साथ बनी ऊंची इमारतें
कर्णप्रयाग में ठीक नदी के किनारे के साथ-साथ बनी ऊंची इमारतें

नदियाँ अपनी शक्ति दिखाते हुए
नदियाँ अपनी शक्ति दिखाते हुए 




आईए कुछ और चित्रों से समझने का प्रयास करतें हैं कि कैसे पहाड़ों में पर्यावरण के साथ अनुचित खिलवाड़ किया जा रहा है -

पर्यावरण पर प्रभाव का बिना पूरी तरह अध्ययन करे हुए जहां तहां पहाड़ काट कर और विस्फोट करके सडकें बना दी जाती हैं जिससे पहाड़ अस्थिर होते हैं और ज़मीन खिसकने की सम्भावना और बढ़ती है 

सड़कें बनाने के लिए अंधाधुंध काटे जा रहे हैं पहाड़
सड़कें बनाने के लिए अंधाधुंध काटे जा रहे हैं पहाड़

सड़क चौड़ी करने के लिए ध्वस्त पहाड़ की क्षतिग्रस्त दयनीय स्थिति
सड़क चौड़ी करने के लिए ध्वस्त पहाड़ की क्षतिग्रस्त दयनीय स्थिति 



पर्यटकों को लुभाने के लिए चप्पे-चप्पे पर बहु मंजिला होटल, रेस्टोरेंट, ‘रिसोर्ट बना दिए गए हैं , पेड़ और पहाड़ काट के , नदी के किनारों के ऊपर , नदी के साथ हर जगह । हरे भरे पहाड़ी क्षेत्र अब भद्दे कॉन्क्रीट जंगल बनते जा रहे हैं 


रामपुर-बुशहर में ठीक नदी के किनारे के ऊपर बना एक होटल
रामपुर-बुशहर में ठीक नदी के किनारे के ऊपर बना एक होटल न केवल नदी के ठीक ऊपर  बनना अनुचित है बल्कि यह पूछने की आवश्यकता भी नहीं है कि इसका कूड़ा कहाँ जाता है !


पारम्परिक ढंग से बने पहाड़ी घरों को नकार कर स्थानीय लोग अपने लिए भी कॉन्क्रीट जंगल ही खड़े करते जा रहे हैं  हिमालय में भूकंपों के आने की संभावना अधिक है , इसलिए यहाँ बहुमंज़िला इमारतें बनाना सुरक्षित नहीं हैं 


कॉन्क्रीट जंगल
कॉन्क्रीट जंगल


शिक्षा के नाम पर आवश्यकता से कहीं अधिक संख्या में विश्वविद्यालयों को निर्माण की अंधी अनुमति दी जा रही है जिससे कॉन्क्रीट जंगल और भी फैल रहा है । अनेक धनवान और प्रभावशाली व्यक्ति पहाड़ी राज्यों के न होते हुए भी किसी न किसी 'जुगाड़' के के ज़रिए पहाड़ों में अपने बंगले बनाने की होड़ में हैं 


सोलन में शूलिनी विश्वविद्यालय ( काटे हुए पहाड़ पर ध्यान दें )
सोलन में शूलिनी विश्वविद्यालय ( काटे हुए पहाड़ पर ध्यान दें जिससे पेड़ काट काट के उसे नंगा कर दिया गया है )
ऐसे शिक्षा संसथान किस काम के जो प्रकृति ही मिटाने पे उतारू हो जायें ? यह कैसी 'शिक्षा' है ?

जे. पी. विश्वविद्यालय ( ऐसे अनेक कॉन्क्रीट जंगल पहाड़ों में तेज़ी से खड़े होते जा रहे हैं )
जे. पी. विश्वविद्यालय ( ऐसे अनेक कॉन्क्रीट जंगल पहाड़ों में तेज़ी से खड़े होते जा रहे हैं )

शिमला के पास प्रियंका गाँधी का विवादास्पद बंगला
शिमला के पास प्रियंका गाँधी का विवादास्पद बंगला 





जल विद्युत् परियोजनाओं से हानि 


'आधुनिक' run of the river ( बिना कुण्ड बनाए नदी के जल के वेग से बिजली बनाना ) तकनीक के नाम पर और अधिक बिजली उत्पादन के लिए पहाड़ों के सीने में विस्फोट करके विशालकाय सुरंगें बनाई जाती हैं ( उदहारण के तौर पे 10 - 10 मीटर चौड़ी और कई किलोमीटर लम्बी ) और नदियों के पानी का मार्ग बदल कर इन सुरंगों में ले जाकर बिजली पैदा की जाती है  इन सुरंगों से न केवल पहाड़ अस्थिर हो जाते हैं और भूस्खलन की घटनाएं बढ़ती हैं बल्कि एक और बहुत बड़ा नुक्सान होता है - पहाड़ों में पानी के भूमिगत प्राकृतिक स्रोत नष्ट हो जाते हैं  नदियों में पानी घटने से हरियाली भी कम होती है और जलवायु बुरी तरह प्रभावित होती है 

नाथ्पा-जाखड़ी जल-विद्युत् परियोजना के लिए पहाड़ों को चीर कर बनाई गयी २७ किलोमीटर लम्बी सुरंग
नाथ्पा-जाखड़ी जल-विद्युत् परियोजना के लिए पहाड़ों को चीर कर बनाई गयी २७ किलोमीटर लम्बी सुरंग
जिस में सतलुज नदी का पानी मोड़ दिया जाता है । परिणामस्वरूप सतलुज बहुत खाली और सूखी हो चुकी है ।

पहाड़ों को खोखला करती 'विनाशकारी विकास' की सुरंगें - १
पहाड़ों को खोखला करती 'विनाशकारी विकास' की सुरंगें - १

पहाड़ों को खोखला करती 'विनाशकारी विकास' की सुरंगें - २
पहाड़ों को खोखला करती 'विनाशकारी विकास' की सुरंगें - २

सीमेंट से भरी सतलुज - १
नदियों के किनारों को भी कॉन्क्रीट से पोत पोत के भद्दा बना दिया गया है
 यह चित्र हिमाचल के किन्नौर में जे.पी. की करछ्म परियोजना के पास सतलुज नदी की स्थिति दर्शाता है - १

सीमेंट से भरी सतलुज - २
नदियों के किनारों को भी कॉन्क्रीट से पोत पोत के भद्दा बना दिया गया है
 यह चित्र हिमाचल के किन्नौर में जे.पी. की करछ्म परियोजना के पास सतलुज नदी की स्थिति दर्शाता है - २ 

जोशीमठ के पास बनती विद्युत् परियोजना ( घाटी के दोनों ओर हरियाली में अंतर देखें )
जोशीमठ के पास बनती विद्युत् परियोजना  ( घाटी के दोनों ओर हरियाली में अंतर देखें )


खनिज पदार्थों के लिए अंधाधुध खनन हो रहा है  धनवान और प्रभावशाली उद्योगपतियों को सीमेंट फेक्टरियाँ लगाने के ठेके दिए जा रहे हैं  जो हमारे पहाड़ तोड़-तोड़ कर खोखले कर के उनका सीमेंट बना कर बेच रहे हैं और पहले से भी अधिक धनवान हो रहे हैं 

सीमेंट कारखाना
सीमेंट कारखाना


उद्योगों को करों में छूट दे-दे कर पहाड़ों में कारखाने लगाने के लिए लगातार आमंत्रित किया जा रहा है और अब स्थिति यह है कि कई तरह के रासायनिक कारखानों ने पहाड़ों में अपने पैर पसार लिए हैं और निरंतर जलवायु और नदियों को दूषित कर रहे हैं 

भ्रष्टाचार से कूट-कूट कर भरा हुआ राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र विभिन्न जल विद्युत् परियोजनाओं, उद्योगों, और अनधिकृत निर्माण का पर्यावरण पर प्रभाव का सही ढंग से आंकलन किए बिना ही स्वीकृति दे देता है , या आँख मूँद लेता है । 



अपवित्र हुए तीर्थ

पवित्र तीर्थ स्थान भी कहाँ बचे हुए हैं  तीर्थ से अधिक अब वे एक व्यावसायिक केंद्र बनते जा रहे हैं , जिनके आस पास आपको हर तरह की दुकानें और दुकानदार मिलेंगे, हर तरह के खाने पीने के ढाबे और रेस्टोरेंट , सुख साधनों से भरपूर होटल  हो सकता है कई बहरूपिए ढोंगी साधूओँ से भी आपकी भेंट हो जाए जो आप से 'सही ढंग से और जल्दी पूजा करवा देने' का वादा करेंगे  मंदिरों तक पहुँचने के लिए ऑटो रिक्शा और हेलीकाप्टर, मंदिरों के रास्ते में पेप्सी और कोका कोला की सुविधा इत्यादि इत्यादि  सुनने में तो यह भी आया है की केदारनाथ मंदिर के बहुत पास ही शौचालय तक बना दिए गए थे  अधिक्तर लोगों के लिए अब यह समर्पण भाव से की जाने वाली तीर्थ यात्राएँ न हो कर केवल भोगी प्रवृत्ती और मनोरंजन वाला पर्यटन मात्र रह गयी हैं, मानो कोई पिकनिक हो !

नैना देवी मंदिर के रास्ते में दुकानें ही दुकानें
नैना देवी मंदिर के रास्ते में दुकानें ही दुकानें
नैना देवी मंदिर के बिलकुल पास बिकते हुए गोलगप्पे
सब सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है! मंदिर के १०० मीटर पास भी गोलगप्पे और विभिन्न प्रकार का चटपटा भोजन बेचने वाले भी मिलेंगे । नैना देवी मंदिर के बिलकुल पास बिकते हुए गोलगप्पे ।

अब ऐसी चीज़ें हर स्थान पर उपलब्ध है... और इनके अवशेष भी !
अब ऐसी चीज़ें हर स्थान पर उपलब्ध है... और इनके अवशेष भी !


प्रकृति ने कहर नहीं बरसाया , अपितु मनुष्य के कुकर्म जब असहनीय सीमा लांघ कर प्रकृति का गला घोंटने लगे तब मनुष्य द्वारा स्थापित 'अनैतिक विनाशकारी विकास' के चिन्हों को पलक झपकते ही नष्ट कर दिया  सालों और दशकों का 'विकास' सैकिंडों में बह गया ! केदारनाथ मंदिर की प्राचीन चित्र और बाढ़ के बाद के चित्र को देखिये , कोई अधिक अंतर नही है  केवल आधुनिकीकरण का कॉन्क्रीट जंगल अब वहां से मिट गया है , बाकी सब पहले जैसा ही है !



केदारनाथ मंदिर का पुराना चित्र
केदारनाथ मंदिर का पुराना चित्र




अब जब बाढ़ प्रभावित पहाड़ी क्षेत्रों के पुनर्निर्माण की बात करी जा रही है तो सोचना पड़ेगा कि निर्माण या विकास किसे माना जाए - केवल मकान  या इमारतें दुबारा बना देने को ? या पर्यावरण का का सम्मान करते हुए उसके अनुरूप विकास करने को ?

प्रकृति की लय के अनुरूप अपने आप को ढालने के बजाय एक आम आदमी सिर्फ सुख सुविधा की इच्छा कर रहा है  एक आपातकालीन स्थिति (और वो भी पहाड़ों के विषम भूगोल में ) में कठिनाई होना स्वाभाविक है  जो हुआ अच्छा नहीं हुआ , परन्तु कुछ धैर्य अगर फसे हुए लोग भी रखते तो अवश्य स्थिति और शीघ्र नियंत्रण में आती  आपने अभी उत्तराखंड की बाढ़ के समाचारों में देखा होगा कि सेना द्वारा सराहनीय बचाव कार्य के उपरान्त भी बहुत सारे बचाए गए लोग यही शिकायत कर रहे थे कि "हमें बहुत मुसीबत झेलनी पड़ी..."  

यह विचार शायद बहुत कम लोगों के मन में आया हो कि प्रकृति के साथ हम क्या क्या करते आये हैं , अपने पहाड़ों को किस किस तरह छलनी करते आये हैंकैसे यह विनाश लीला हम पर थोपी नहीं गयी बल्कि हमारी अपनी ही करनी का फल है 

प्रकृति को विनाशकारी कह के त्राहि त्राहि करने से पहले इतना अवश्य सोचना चाहिए कि हम में से अधिकाँश एक ऐसी उपभोक्तावादी व्यवस्था का हिस्सा हैंजो प्रकृति को एक 'वस्तु मात्र मान कर निगले जा रही है

कचरे और प्रदुषण की मार सहती ब्यास और सतलुज
कचरे और प्रदुषण की मार सहती ब्यास और सतलुज


बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आजकल पैसे को 'ख़ज़ाना' कहा जाता है और प्रकृति को 'संसाधन विनाश तब शुरू होता है जब मनुष्य प्रकृति को अपनी 'जननी' न समझ कर स्वार्थ सिद्धि का 'संसाधन' मात्र समझने लग जाता है 

विशेषकर पहाड़ी क्षेत्रों में जिस तरह का लोभी खिलवाड़ प्रकृति से चल रहा है हम में से कई लोग सोचने पर विवश हैं कि प्रकृति हम पर आपदा लेकर आई थी या उल्टा हम उस पर ? और प्रकृति ने बस मनुष्य को उसकी औकात समझाने के लिए यह तांडव किया ?

दोष सबका है - सरकार , प्रशासन , उद्योग , पर्यटक और स्थानीय लोग भी  दुख की बात है कि जिनके हाथ में अंधे विकास की नीतियाँ बनाने की शक्ति और लगाम है, उनमें पर्यावरण के संरक्षण के लिए कुछ करने की समझ, प्राथमिक्ता और इच्छाशक्ति नहीं है और आप - हम जैसे कुछ प्रकृति प्रेमी जो प्रकृति को बचाना चाहते हैं उनके पास नियंत्रण की सम्पूर्ण शक्ति नहीं है  



प्रकृति के साथ हो रहे अन्याय की दिशा बदली कैसे जाए ? कुछ नया सोचने और करने  की आवश्यकता है  चंद लोभी , भ्रष्ट और उदासीन राजनीती पार्टियों और उद्योगपतियों के हाथों और स्वयं अपने हाथों भीहम अपनी देव भूमि का भक्षण होता देख हाथ पे हाथ धरे नहीं बैठ सकते 


- पाँशुल



2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत परिश्रम से तैयार किया गया लेख. आपने उन तथ्यो की ओर भी ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है जिन पर जनसामान्य का ध्यान नही जाता. यह तय है कि विकास व पर्यावरण के मध्य सन्तुलन नही रखा गया तो उत्तराखण्ड जैसी कई आपदाओ से होकर हमे गुजरना पडेगा. आपका यह प्रयास सराहनीय व अनुकरणीय है.

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  2. Very impressive, insightful and done with lot of effort. Great to see this, this certainly needs wider dissemination.

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